Thursday, September 19, 2019

हरियाणा को जो लगती है बोझ, बेल्जियम परिवार ने लिया गोद

 
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर साहब का एक टिविट देखा, जिसमें बेल्जियम से आये दंपत्ति ने कैथल आकर बेटी को गोद लिया। उस दंपत्ति को हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल जी बधाई औऱ शुभकामनाएं दे रहे थे और देना भी चाहिये। बेल्जियम परिवार की नजर हरियाणा के कैथल की लड़की पर पड़ी और उसको गोद ले लिया गया। भारत से जाने के बाद उसका बेहतर माहौल के साथ नया संस्कार भी मिलेगा।
 अच्छा लगा कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर साहब की टीम इतनी सजग है कि अखबार में छपी खबर को संज्ञान लिया और बधाई संदेश दे दिया। पर एक सवाल मेरे मन में आज और अभी उठ रहा है कि जो हरियाणा लिंगानुपात की समस्या से जूझ रहा है, क्या उस राज्य के लिये यह कदम बेहतर हो सकता है?
इस सवाल का जवाब अपने मन में ढूंढिए और कोई जवाब नहीं मिले तो पड़ोसी, दोस्त की मदद भी लीजिए। मैं, गोपाल कांडा सोचता हूं कि क्या हरियाणा का कोई भी परिवार इसको गोद नहीं ले सकता था। हम हरियाणा के लोग धर्म में ज्यादा विश्ववास रखते है। यहां हर शहर में एक संत का आश्रम है और वहां संतवाणी सुनाई जाती है। क्या धर्म इसकी इजाजत देता है। कैथल एक आश्रम में अनाथ लड़की को बेल्जियम परिवार ने गोद लिया है। क्या कैथल सहित अन्य जिलों में इतनी संपंन्नता नहीं थी, उस लड़की को गोद ले लें और वो भी तब जब आपके राज्य में लड़का लड़की के अनुपात में अंतर है।
  नीति आयोग के रिपोर्ट के अनुसार देश के 21 बड़े राज्यों में से 17 राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात में गिरावट दर्ज की गई है. गुजरात में गिरावट 53 पॉइंट्स नीचे पहुंच गई है। नीति आयोग द्वारा जारी इस रिपोर्ट में भ्रूण का लिंग परीक्षण कराकर होने वाले गर्भपात के मामले में जांच की जरूरत पर जोर दिया गया है । रिपोर्ट के अनुसार जन्म के समय लिंगानुपात मामले में 10 या उससे ज्यादा पॉइंट्स की पर्याप्त गिरावट होने वाले राज्यों में से एक गुजरात में प्रति 1,000 पुरुषों पर 907 महिलाओं के अनुपात से गिरकर अब 854 हो गया है. यहां साल 2012-14 ( आधार वर्ष) से 2013-15 (संदर्भ वर्ष) के बीच 53 पॉइंट्स की गिरावट हुई है।
स्वस्थ राज्य, प्रगतिशील भारत की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात के बाद हरियाणा का स्थान है। यहां 35 पॉइंट्स की गिरावट दर्ज हुई है, इसके बाद राजस्थान (32 पॉइंट्स), उत्तराखंड (27 पॉइंट्स), महाराष्ट्र (18 पॉइंट्स), हिमाचल प्रदेश (14 पॉइंट्स), छत्तीसगढ़ (12 पॉइंट्स) और कर्नाटक (11 पॉइंट्स) की गिरावट हुई है।
 सवाल यह उठता है कि जिस राज्य में धार्मिक काम करने में जनता पीछे नहीं है,जहां गौशाला गाय को सुरक्षित रखने के लिये है,कन्या को  सुरक्षित रखने के लिये कोई कारगर उपाय नहीं। हरियाणा लोकहित पार्टी के अध्यक्ष गोपाल कांडा, #gopalkanda  इसको सही नजर से नहीं देखते है, उनकाकहना है कि समाज के लोगों को आगे आना चाहिये, उनका एक नारा है...
अब न बनाओ कोई नया किस्सा, बेटियों को दो अब समाज में हिस्सा


Wednesday, September 18, 2019

हरियाणा चुनाव से बेरोजगारी का मुद्दा गायब है...


हरियाणा में चुनावी माहौल है, राष्ट्रीय स्तर की कोई भी पार्टी बोरोजगारी को लेकर बात नहीं कर रही है और नहीं करना चाहती है। बेरोजगारी पर अब टीवी से चर्चा और परिचर्चा का दौर गायब हो चुका है। ऐसे में हरियाणा लोकहित पार्टी ने आज भी बेरोजगारी के मुद्दे को जिंदा रखते हुए रोजगार देने का आश्वासन दे रही है।
 हलोपा के अध्यक्ष गोपाल कांडा ने रोजगारी को भी इस बार मुद्दा बनाया है रोजगार सृजन , कौशल विकास सहित अन्य मुद्दे को उठा रही है। रोजगार देने के वादा कर रही है, अगर सत्ता का सुख पार्टी भोगती है, तो रोजगार का स्वाद भी युवा जरूर चखेंगे।
45 साल में बेरोज़गारी सबसे अधिक है। 31 मई को आई आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि हो गई है। 2017 जुलाई से लेकर 2018 जून तक की अवधि में बेरोज़गारी हर स्तर पर बढ़ी हुई देखी गई। चुनाव के कारण सरकार ने इसे जारी नहीं किया था। तरह-तरह के विवादों से इसे संदिग्ध बना दिया। कभी कहा गया कि यह झूठ है और कभी कहा गया कि इसका पैमाना सही नहीं है। ख़ैर यह रिपोर्ट आ जाती तब भी कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता लेकिन जनता तक यह आंकड़ा न पहुंचे इसके लिए रिपोर्ट को जारी न होने दिया गया। इसके विरोध में राष्ट्रीय सांख्यिकीय आयोग के दो सदस्यों ने इस्तीफा भी दे दिया। तब भी सरकार टस से मस नहीं हुई। सरकार बनने के बाद इस रिपोर्ट को जारी कर दिया गया। बेरोज़गारी की दर 45 साल में सबसे अधिक है।

2019 चुनाव की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि उसने बेरोज़गारी के मुद्दे को ख़त्म कर दिया। अब इस मुद्दे की राजनीतिक साख नहीं बची। बेरोज़गारों ने भी आगे आकर कहा कि बेरोज़गारी मुद्दा नहीं है। राष्ट्रवाद मुद्दा है। इसलिए अब जब यह रिपोर्ट आई है कि बेरोज़गारी अपने उच्चतम स्तर पर है इससे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला। न सरकार को, न बेरोज़गार को। कोई भी संवेदनशील सरकार ज़रुर इन आंकड़ों से चिन्तित होगी, लेकिन वह इस दबाव में नहीं आएगी कि रोज़गार का सवाल उसके लिए राजनीतिक ख़तरा पैदा कर सकता है। पहले के चुनावों में भी बेरोज़गारी के बाद भी राजनीतिक दलों ने जीत हासिल की है लेकिन इस बार जब बेरोज़गारी रिकार्ड स्तर पर थी तब कहा जा रहा था कि इससे व्यवस्था पर दबाव बनेगा और सत्ताधारी दल बीजेपी मुश्किल में आ सकती है। मगर बेरोज़गारों ने अपनी बेरोज़गारी के सवाल को रिजेक्ट करते हुए बीजेपी को बल दिया है।

इस मायने में बीजेपी की कामयाबी कई मायनों में राजनीतिक रूप से श्रेष्ठ है। किसी बेरोज़गार में अपने प्रति विश्वास पैदा करना और बनाए रखना साधारण बात नहीं है। बीजेपी को इसका श्रेय मिलना ही चाहिए। जो वर्ग आपके ख़िलाफ़ हो सकता था वही आपका समर्थक बन जाए तो बीजेपी और उसके नेतृत्व प्रधानमंत्री मोदी की क्षमता को समझना चाहिए। कांग्रेस का यकीन ग़लत निकला कि बेरोज़गारी का मुद्दा उसे राजनीतिक कामयाबी दे सकता है। राहुल गांधी ने एक साल में 4 लाख केंद्र की नौकरियां भरने का वादा किया वह भी बेरोज़गारों ने रिजेक्ट कर दिया। बेरोज़गारों को भी श्रेय देना चाहिए कि उन्होंने राष्ट्रवाद का साथ दिया। अपने पेट के सवालों का नहीं। यह बहुत बड़ी बात है। कोई एक दिन अपनी नौकरी दांव पर नहीं लगा सकता, बेरोज़गारों ने अपना भविष्य दांव पर लगा दिया।
 फिर भी बेरोज़गारों को किसानों से सीखना चाहिए। व्यापारियों से भी सीखना चाहिए। साठ साल के व्यापारियों के लिए 3000 पेंशन की व्यवस्था बनी है। ऐसा दावे से नहीं कहूंगा कि व्यापारियों ने इसके लिए आंदोलन नहीं किया होगा मगर यह ज़रूर है कि उससे अधिक नौजवानों ने अपनी नौकरी के लिए आंदोलन किया था। हर राज्य में लाठियां खाई थीं। किसानों ने भी राष्ट्रवाद का साथ दिया मगर अपने मुद्दे को नहीं छोड़ा। आंदोलन किया और सरकार पर अंत अंत तक दबाव बनाए रखा। उसका नतीजा सार्थक निकला। मोदी सरकार के पहले ही फैसले में सभी किसानों को 6000 सालाना का पीएम सम्मान मिल गया। 60 साल के किसानों को 3000 मासिक पेंशन भी मिली। बेरोज़गारों को वह रिपोर्ट मिली कि 45 साल में बेरोज़गारी सबसे अधिक है जिसका कोई मतलब नहीं है।


Tuesday, September 17, 2019

वसुधा का नेता कौन हुआ ?


“वसुधा का नेता कौन हुआ? भूखंड-विजेता कौन हुआ?
अतुलित यश-क्रेता कौन हुआ? नव-धर्म-प्रणेता कौन हुआ?
जिसने न कभी आराम किया, विघ्नों में रहकर नाम किया”
आज सवाल यहीं उठ रहा है कि वसुधा का नेता कौन हुआ ? आज हरियाणा आर्थिक मोर्चो में लुढ़क गया है, मनोहर सरकार को नित्य नए बहाने चाहिये। शिक्षकों के मांग कुचल दिये गए, पांच सितंबर बीते एक पखवाड़ा भी नहीं गुजरा कि शिक्षकों पर पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया। मनोहर सरकार ने शिक्षक दिवस का तोहफा जो दिया है, उसका हिसाब शिक्षक संघ भी मतदान करके हिसाब चुकाएंगे। जुमले की सरकार वास्तविक रूप से कहां है, वादों के ढेर है और उसमें से बदबूं आ रही है।
   मनोहर सरकार अपने में मस्त है और 75 पार का सोपान इस बार देख रही है, लेकिन जनता का नब्ज कौन सी पार्टी पकड़ती है, यह आने वाले समय में पता चल जाएगा।  ‘देश में नमो और प्रदेश में मनो’ इस तरह के जुमले हरियाणा में चर्चा का विषय है। भले ही पीने के लिये पानी सरकार मुहैया नहीं करवा पा रही हो, लेकिन जुमले नित्य नए सामने आ रहे है। आप उसी से अपना गुजारा कर लीजिए।
 देश का जीडीपी 5 प्रतिशत पड़ है, हरियाणा का जीडीपी 12 वें पायदान से 13 वें पायदान पर पहुंच चुका है। बैंकों में हुए सबसे ज्यादा फ्राड ने बैंक फ्राड की राशि पिछले साल की तुलना में 73.8 प्रतिशत अधिक हो गई है। 2017-18 में 41,167 करोड़ का फ्राड हुआ था। 2018-19 में 71,542 करोड़ का फ्राड हुआ है। केस की संख्या के मामले में 15 प्रतिशत की वृद्धि है। फ्राड के 6801 मामले दर्ज हुए हैं। 90 प्रतिशत राशि सरकारी बैंकों की है।

डिजिटल इंडिया के तमाशे के दौर में बैंक नोट का चलन भी 17 प्रतिशत बढ़ा है। वित्त वर्ष 18 में 18 लाख करोड़ नोट का चलन था तो वित्त वर्ष 19 में 21 लाख करोड़ से अधिक हो गया है। ये रिज़र्व बैंक का आंकड़ा है। 20 रुपये के जाली नोटों में 87 प्रतिशत की वृद्धि है और 50 रुपये के जाली नोटों में 57 प्रतिशत की। 100 रुपये के जाली नोटों के मामले में गिरावट देखी गई है।
 नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी(NBFC) की सालाना रिपोर्ट कहती है कि कर्ज़ लेने वाली कंपनियों की संख्या कम हो गई है। 20 प्रतिशत की गिरावट है।
 ONGC अपना कर्ज़ चुकाने के लिए विदेशों से 2 अरब डॉलर का कर्ज़ लेगी। इस फंड का इस्तमाल 15000 करोड़ का लोन चुकाने में होगा। वोडाफोन आइडिया के कारण आदित्य बिड़ला ग्रुप को दस साल में पहली बार घाटे का मुंह देखना पड़ा है। पूरे समूह का घाटा 6134 करोड़ हो गया है। NHAI की स्थिति मत पूछिए संपत्ति कुर्क करने की नौबत आ गई है। फिर भी सरकार के जुमले में कमी नहीं है।
हरियाणा की भी आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं है। निजीकरण का दौर चल रहा है। सरकारी कंपनी लिमिटेड का रूप धारण कर रही है। प्रोजेक्त पीपीटी के सहारे चल रही है।
 सवाल यहीं उठ रहा है कि वसुधा का नेता कौन है? हरियाणा में क्षेत्रीय गठबंधन के सहारे सरकार चली है। क्या इस बार भी हरियाणा लोकहित पार्टी के गोपाल कांडा मिलीजुली सरकार बनाकर सत्ता का सुख भोग पाएंगे? वक्त के साथ इस सवाल को भी यहीं विराम देता हूं !

Monday, September 16, 2019

मैं और हमारी सिरसा...


 गूगल सर्च इंजन पर जब आप सिरसा की समस्या को खोजेंगे, तो आपकों पता चल जाएगा कि सिरसा के हालात क्या है? सिरसा ही नहीं हरियाणा के हालात क्या है ? दिल्ली से सटा हुआ इलाका होने के बावजूद गुडग्राम की स्थिति आप देख लों। दिल्ली से आप जब गुडग्राम होते हुए रोहतक सड़क मार्ग पर पहुंचते है, तो सड़क की स्थिति देखकर आपको सरकार की स्थिति समझ में आ जाएगी। ऐसा इसलिये कहना पड़ रहा है कि सरकार के कथनी और करनी दोनों में ही अंतर स्पष्ट दिखता है।

 मेरा जुड़ाव सिरसा से है, इसलिये मैं हमेशा से ‘हमारी सिरसा’ पर बात करना पसंद करता हूं। इंसान जहां रहता है, पहला सुधार वो वहां से करने का प्रयास करता है। मैं भी वहीं कर रहा हूं। सिरसा के विकास की गाथा भी जुमले की तरह है। अच्छे वादे और सटीक जुमले की रोशनी में सिरसा का विकास गुम हो गया है।

 अगर भरोसा नहीं हो तो घर बैठे गूगल सर्च इंजन पर सर्च कीजिए,’सिरसा की समस्या’। आपके सवालों के जवाब खुद व खुद मिल जाएंगे। समस्या अकसर से अवाम यानि आम लोगों की आवाज रही है। गूगल सर्च इंजन में दर्ज समस्या गलत नहीं है, यह किसी अखबार दारा आम लोगों के लिये उठाई गई आवाज है। अगर इन समस्याओं को पढ़ने के बाद आप सिरसा क्षेत्र का भ्रमण करेंगे तो आप इन समस्याओं को महसूस करेंगे।

अब बात की सिरसा के समस्याओं की। एक एनजीओ ने सिरसा के समस्याओं पर सर्वे किया है, जिसकी रिपोर्ट गूगल पर भी सार्वजनिक है। आप देख सकते हैं, उस रिपोर्ट के आधार पर सबसे बड़ी समस्या सिरसा के सौंदर्यीकरण में है। बढ़ती डेयरियों की संख्या, अवारा पशु और सीवेज लाइन।

इन मुख्य तीन समस्याओं से सिरसावासी जूझ रहे है। शहर के सौंदर्यीकरण के नाम हरेक गली मोहल्ली में सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के फोटों लगे है। दिल्ली से मेरे आए हुए एक माह ही हुए है और मैं यह पूछने पर मजबूर हूं कि सतारूढ़ पार्टी के तरफ से सिरसा क्षेत्र का उम्मीदवार कौन होगा? पोस्टर के हिसाब से यहां कई उम्मीदवार है, जो हरेक गली मोहल्ले में लगे पोस्टर को देखकर आप उसकी उम्मीदवारी की पहचान कर सकते है।

छोड़िये राजनीति से दूर हम सिरसा के विकास की बात करते है, जिस गल्ली मोहल्ले में आप जाएंगे, तो आपको खुद लगेगा कि यहां साफ सफाई की बड़ी समस्या है। मेरे यहां आए हुए एक महीने हो गए, लेकिन अभी तक सतारूढ़ पार्टी का कोई नेता मुझे सड़क पर झाड़ू मारते हुए स्वच्छ भारत अभियान का हिस्सा बनते हुए नहीं दिखा औऱ नहीं इसकी न्यूज पेपर में दिखी।लगता है कि केंद्र की इस योजना से सिरसा के सतारूढ़ नेताओं ने परहेज कर लिया हो, इसलिये काम उनके पोस्टर में ही दिख रहे हैं।

सड़क के किनारे सौंदर्यीकरण की जगह कचरों का ढेर लगा हुआ है। भरोस नहीं है तो शहर में घूमिए और देखिये अपने शहर को। चुनावी साल है, लोकतंत्र में एक बार वोट देने का मौका मिलता है। वोट जरूर दीजिये, लेकिन उनको चुनिए जो आपके अपने बीच का होगा और आपकी समस्याओं को सुने और समझें।

 सिरसा शहर में अवैध डेयरी,बेरोजगारी,डाक्टरों की कमी , उत्कृष्ट स्कूल सहित कई समस्याएं है। इसको आपको देखना और समझना होगा। तब कहीं जाकर आपको वोट देने के लिये उम्मीदवार को चुनना होगा।

Sunday, September 15, 2019

मेरी अधूरी सिरसा ...


वो शहर आप जहां जन्म लेते है और उस शहर से बहुत कुछ सीखते है और वहीं शहर आपको एक मुकाम तक पहुंचाता है। स्वभाविक है वो आपके लिये खास हो जाता है। जिंदगी के सफर 55 वां बसंत मैंने इस शहर में देखें, इस शहर ने मुझे बहुत कुछ दिया है। आप सोचते होंगे भलां कोई शहर आपको कुछ दे सकता है? मुझे ऐसा लगता है हर शहर हर इंसान को कुछ न कुछ देता है। सिरसा ने भी मुझे बहुत कुछ दिया है। इसी शहर में मुझे अच्छे दोस्त भी मिले, जिन्होंने मेरी जिंदगी को एक मुकाम दिया। बचपन की यादों से जब बाहर जवानी की दहलीज पर कदम रखी तो कैरियर को एक मुकाम देने को लेकर परिवारवालों का निरंतर दवाब बनना शुरू हो गया। शुरूआत बिजनेस से शुरू की। आप सभी जानते होंगे शू मेकिंग से शो रूम का सफर मेरे लिये बहुत ही कठिन रहा। जब बिजनेस की शुरूआत की तो भारत आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा था। इस दौर में नया बिजनेस शुरू करना बेहद कठिन था। दोस्त अकसर सलाह देते थे, कि अभी बिजनेस मत शुरू करों,लेकिन मैं काम के प्रति शुरू से जिद्दी था। कभी अंजाम का नहीं सोचा, शायद यहीं कारण है कि मेरे जिद्द ने मेरी दुनिया ही बदल दी। 

    जिंदगी में एक ऐसा समय आता है, जब आप अपने शहर के लिये कुछ सोचते है। मैं जब सत्ता था, तब मैंने भी कुछ सपनें सिरसा के लिये देखें। इस शहर ने मुझे बहुत कुछ दिया था, अब समय था कि इस शहर को और आने वाली पीढ़ी को बहुत कुछ दूं। सिरसा के विकास को लेकर मेरे दिमाग में खाका खींच चुका था, बस इसको जमीनी स्तर पर आकार देना था। लेकिन जिंदगी ने एक बार फिर करवट बदली और मैं राजनीति संकट से घिर गया। मुझ पर आरोप का दौर शुरू हो गया। आपके संघर्ष को कोई नहीं देखता, लेकिन आपकी सफलता पर चर्चा चलती रहती है। मेरे साथ भी यहीं हुआ, मेरी सफलता की कहानी सबके जुवां पर थी और हो भी क्यों न।
       
 इधर सिरसा के विकास का खाका जो मेरे दिमाग में चल रहा था, उसमें एक दो योजना को मैंने आकार दे दिया था। जैसे आरओ वाटर की सप्लाई। सिरसावासियों के लिये अमृत से कम नहीं था। क्योंकि जल है तो जीवन है। लेकिन मेरा सपना अभी तक अधूरा था। अब मैं सत्ता से दूर था, लेकिन मेरी हिम्मत को तोड़ने की जो कोशिश की गई थी, उसमें मेरी आत्म शक्ति ने फिर से ताकत भर दी। मेरे दिमाग में एक ही बात चल रही थी कि मैं कोई राजघराने में पैदा नहीं हुआ, जो सबकुछ खो जाने पर मुझे दुख होगा। मैंने जो भी हासिल किया यहीं किया और अपने दम पर किया। ईश्वर के आगे किसी का नहीं चलता है, तो फिर मेरा कैसा चलेगा?
मेरा परिवार मेरे साथ था, शायद इन्हीं कारणों से मैं टूटने के बावजूद भी अपनी हिम्मत को जोड़ने में कामयाब रहा। मैंने एक बार फिर से प्रतिज्ञा ली कि जिस सिरसा ने मुझे इतना कुछ दिया, अब मैं उस सिरसा को भी कुछ दूंगा। मेरी सिरसा के विकास का जो खाका आज भी मेरे दिमाग में है, उस खाका को पूरा करने के लिये मैं इस बार फिर चुनाव में हरियाणा लोकहित पार्टी के तरफ से उम्मीदवार के रूप में उतर रहा हूं। आइए मेरी अधूरी सिरसा को फिर से पूरा करूं।

  गोपाल कांडा जी से चर्चा उपरांत